पाठ 11 - नौबतखाने मे इबादत - यतींद्र मिश्र - Class 10 Hindi क्षितिज-2 (Ncert Solutions)
Ultimate NCERT Solutions for पाठ 11: नौबतखाने मे इबादत (यतींद्र मिश्र)
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NCERT Solutions for Class 10 Hindi
पाठ 11: नौबतखाने मे इबादत (यतींद्र मिश्र)
(प्रश्न उत्तर, जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएँ)
“यतींद्र मिश्र” का जीवन परिचय एवं साहित्यिक योगदान
जीवन परिचय
यतींद्र मिश्र एक प्रसिद्ध हिंदी लेखक, कवि और संस्कृति विशेषज्ञ हैं। उनका जन्म 10 अक्टूबर 1977 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में शिक्षा प्राप्त की और बाद में साहित्य एवं संगीत के क्षेत्र में गहन शोध कार्य किया।
उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, संगीत और इतिहास की गहरी छाप है। वे न केवल एक लेखक हैं, बल्कि एक कुशल संपादक और सांस्कृतिक विचारक भी हैं।
साहित्यिक योगदान
यतींद्र मिश्र ने हिंदी साहित्य को कई उत्कृष्ट कृतियाँ प्रदान की हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
1. प्रमुख कृतियाँ
“भीमसेन जोशी: संगीत और जीवन” – इस पुस्तक में पंडित भीमसेन जोशी के जीवन और संगीत की गहरी व्याख्या की गई है।
“कथासरित्सागर” – यह पुस्तक भारतीय लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित है।
“अयोध्या: नगरी उजड़ी नहीं” – अयोध्या के इतिहास और सांस्कृतिक महत्व पर एक महत्वपूर्ण कृति।
“स्मृति के शहर” – यह काव्य संग्रह उनकी कविताओं का संकलन है, जिसमें स्मृतियों और अनुभूतियों को शब्द दिया गया है।
2. संपादन कार्य
यतींद्र मिश्र ने कई पत्रिकाओं और पुस्तकों का संपादन किया है, जिनमें “वागर्थ” और “नया ज्ञानोदय” जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाएँ शामिल हैं।
3. पुरस्कार और सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार (2015) – “भीमसेन जोशी: संगीत और जीवन” के लिए।
व्यास सम्मान (2018) – हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए।
मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार – साहित्यिक सेवाओं के लिए।
निष्कर्ष
यतींद्र मिश्र हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्य प्रेमियों, बल्कि संगीत और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए भी प्रेरणादायक हैं। उनका लेखन भारतीय परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।
पाठ 11: नौबतखाने मे इबादत (यतींद्र मिश्र) प्रश्न उत्तर
Updated Solution 2024-2025
प्रश्न अभ्यास
प्रश्न 1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?
उत्तर 1:
- शहनाई की दुनिया में डुमराँव को विशेष रूप से याद किया जाता है क्योंकि यहाँ के निवासी उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, जो विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक थे, का जन्म हुआ था।
- शहनाई में इस्तेमाल होने वाली रीड (नरकट), जो एक प्रकार की घास होती है, डुमराँव के सोन नदी के किनारों पर अधिकतर पाई जाती है।
- इस प्रकार, शहनाई और डुमराँव के बीच एक गहरा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध है।
प्रश्न 2. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?
उत्तर 2:
- शहनाई का उल्लेख पारंपरिक अवधी लोकगीतों और चैती में बार-बार किया गया है।
- शहनाई को एक ऐसा वाद्य माना जाता है, जो मंगलमयी वातावरण का निर्माण करता है। इसका उपयोग विशेष रूप से मांगलिक अवसरों पर होता है।
- उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ शहनाई वादन के क्षेत्र में बेजोड़ कलाकार माने जाते हैं। उनके शहनाई वादन ने इसे एक नई पहचान दिलाई, जिसके कारण उन्हें शहनाई की मंगलध्वनि का नायक कहा जाता है।
प्रश्न 3. सुषिर-वाद्यों से क्या अभिप्राय है? शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों के शाह’ की उपाधि क्यों दी गई होगी ?
उत्तर 3:
- सुषिर-वाद्यों से तात्पर्य ऐसे वाद्य यंत्रों से है जिन्हें हवा से बजाया जाता है।
- शहनाई एक ऐसा वाद्य है, जो अत्यधिक मधुर और हृदय को छूने वाला स्वर उत्पन्न करता है। इन वाद्यों में किसी अन्य वाद्य का स्वर शहनाई की तरह मीठा और आकर्षक नहीं होता।
- शहनाई में विभिन्न रागों और रागिनियों को सुरों में ढालने की विशेष क्षमता होती है, जिसे अन्य किसी सुषिर वाद्य से नहीं जोड़ा जा सकता।
- इन विशेषताओं के कारण शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों के शाह’ की उपाधि दी गई होगी।
प्रश्न 4 आशय स्पष्ट कीजिए-
‘फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।’
‘मेरे मालिक सुर बख्श दे । सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ ।’
उत्तर 4:
- आशय: बिस्मिल्ला खाँ अपनी कला को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते थे, न कि भौतिक दिखावे को। जब उन्हें फटी लुंगी पहनने से मना किया गया, तो उन्होंने कहा कि ईश्वर फटा हुआ सुर न दें क्योंकि लुंगी आज फटी है तो कल सिल भी सकती है, लेकिन सुर एक बार बिगड़ गया तो उसे ठीक नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ है कि उनके लिए शहनाई का सुर अधिक महत्वपूर्ण है, न कि बाहरी कपड़े या आंतरिक सौंदर्य।
- आशय: बिस्मिल्ला खाँ खुदा के सामने हाथ जोड़कर कहते हैं, “हे मेरे मालिक! मुझे सच्चा सुर दे, जो इतनी ताजगी और प्रभाव से भरा हो कि सुनने वाले लोग आँसू बहा दें।” उनका अभिप्राय यह है कि सुर की आवाज ऐसी हो कि सुनने वाले उसकी लहरों में समाहित हो जाएं, जिससे उनके दिल में गहरी भावना उत्पन्न हो और उनका हृदय पूरी तरह से सुर के साथ जुड़ जाए।
प्रश्न 5. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
उत्तर 5:
- समय के साथ काशी में कई बदलाव हुए।
- जैसे काशी के पक्के महल से मलाई और बर्फ गायब हो गई, वैसे ही काशी से संगीत, साहित्य और कला की कई महत्वपूर्ण परंपराएँ भी समाप्त हो गईं।
- इन बदलावों को देखकर बिस्मिल्ला खाँ बहुत दुखी होते थे।
प्रश्न 6 पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि-
(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इनसान थे।
उत्तर 6: (क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे:
- बिस्मिल्ला खाँ काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने में शहनाई बजाने का अभ्यास करते थे।
- वे काशी के संकट मोचन मंदिर में हनुमान जयंती पर आयोजित संगीत सभा में भाग लेते थे।
- उन्हें काशी विश्वनाथ के प्रति अपार श्रद्धा थी, और जब भी वे काशी से बाहर रहते थे, वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुंह करके बैठते थे और उनके लिए शहनाई बजाते थे।
- उनका मानना था कि काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं है। यहाँ गंगा, बाबा विश्वनाथ और बालाजी मंदिर हैं।
- मुहर्रम के दौरान वे दस दिन तक हज़रत इमाम हुसैन के प्रति शोक मनाते थे। वे किसी राग-रागिनी में भाग नहीं लेते थे और शोक के समय शहनाई बजाते हुए दालमंडी की ओर पैदल जाते थे। इन उदाहरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि बिस्मिल्ला खाँ एक मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे:
- बिस्मिल्ला खाँ में धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था।
- वे बाबा विश्वनाथ और बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते समय वही श्रद्धा रखते थे, जैसी श्रद्धा वे मुहर्रम के समय मातमी सुरों में व्यक्त करते थे।
- वे भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति और सांप्रदायिक सौहार्द्र के प्रतीक थे।
- बिस्मिल्ला खाँ ने अपनी ज़िंदगी में कभी भी अपने बचपन की बातें, फिल्म देखने का शौक और संगीत के प्रति प्रेम को छिपाया नहीं। वे इन सब बातों को खुले दिल से साझा करते थे।
- ईश्वर से उन्होंने कभी सुख-समृद्धि की प्रार्थना नहीं की; वे केवल सच्चे सुर की माँग करते थे।
- उनके जीवन में कभी अहंकार नहीं था। वे हमेशा विनम्र बने रहे और संगीत के प्रति अपनी सीख को जारी रखते थे।
- वे हमेशा कहते थे कि उन्हें सातों सुरों का सही उपयोग अभी तक नहीं आ सका।
- महान संगीतकार होने के बावजूद वे कभी भी अपनी सादगी नहीं भूलते थे। उनका कहना था कि उन्हें भारतरत्न शहनाई के कारण मिला, न कि लुंगी के कारण।
- वे इस बात से दुखी थे कि आजकल गायकों के मन में संगतियों के लिए कोई सम्मान नहीं बचा है। इन घटनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बिस्मिल्ला खाँ वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे।
प्रश्न 7. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया।
उत्तर 7:
• बिस्मिल्ला खाँ के मामा, सादिक हुसैन और अलीबख्श, मशहूर शहनाई वादक थे। वे रोज सुबह बालाजी मंदिर के पास शहनाई बजाते थे। उनकी मधुर धुनें सुनकर बिस्मिल्ला खाँ के मन में भी संगीत के प्रति गहरा प्रेम जागा।
• उनके नाना भी शहनाई बजाने में माहिर थे। बचपन में जब बिस्मिल्ला खाँ उनकी शहनाई सुनते, तो उन्हें लगता कि इसमें कोई मीठा स्वाद छुपा है। इसी कारण वे शहनाई को चखने की कोशिश भी करते थे!
• संगीत का अभ्यास करने जाते समय बिस्मिल्ला खाँ का रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के घर से होकर गुजरता था। वहाँ वे इन गायिका बहनों को ठुमरी, टप्पा और दादरा गाते हुए सुनते थे, जिससे उनके मन को बहुत सुकून मिलता था। इन्हीं अनुभवों ने उनके मन में संगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा किया।
• एक और दिलचस्प घटना थी कुलसुम हलवाइन की दुकान की। जब वहाँ कचौड़ी तलते समय घी की कलकलाहट होती, तो बिस्मिल्ला खाँ को उसमें संगीत के सुरों का आरोह-अवरोह सुनाई देता था। यहाँ तक कि उन्होंने इस आवाज़ को भी अपने संगीत में ढाल लिया!
• इन सभी लोगों और अनुभवों के अलावा, काशी की समृद्ध संगीत परंपरा ने भी बिस्मिल्ला खाँ की कला को निखारने में बहुत योगदान दिया।

रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 8. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?
उत्तर 8: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की विशेषताएँ जो मुझे प्रभावित करती हैं-
- सांप्रदायिक सौहार्द: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का सांप्रदायिक सौहार्द मुझे बहुत प्रभावित करता है। गंगा के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा, बाबा विश्वनाथ और बालाजी के मंदिरों में शहनाई वादन, और मुहर्रम के मातमी जुलूस में नौहा बजाने के लिए आठ किलोमीटर पैदल चलने की उनकी भावना ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की है।
- निष्काम भाव से संगीत साधना: बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना कभी भी धन कमाने का जरिया नहीं थी। वे हमेशा ईश्वर से सच्चे सुरों का वरदान मांगते रहे, न कि संपत्ति की इच्छाएँ प्रकट कीं। उनके इस निष्काम भाव ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
- निश्छल स्वभाव: उनकी हंसी बच्चों जैसी भोली और स्वाभाविक थी। वे अपने जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों के बारे में खुले मन से बात करते थे, जैसे कि बचपन में फिल्म देखने की बात और रसूलनबाई तथा बतूलनबाई के संगीत से प्रेरणा लेने की बात।
- सादगी पूर्ण जीवन: बिस्मिल्ला खाँ का जीवन सादगी से भरा हुआ था। भारतरत्न प्राप्त करने के बावजूद वे कभी भी फटी हुई लुंगी पहनने में संकोच नहीं करते थे। उनकी यह सादगी मुझे बहुत प्रभावित करती है।
- विनम्रता: बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व में गहरी विनम्रता थी। शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद होने के बावजूद वे हमेशा कहते थे कि उन्हें आज भी सुरों को सही तरीके से निभाने की पूरी तमीज़ नहीं आई।
- संगतियों के प्रति आदर: बिस्मिल्ला खाँ का संगतियों के प्रति गहरा आदर था। वे हमेशा दुख प्रकट करते थे कि गायक लोग संगतियों का सम्मान नहीं करते।
प्रश्न 9. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर 9: बिस्मिल्ला खाँ का मुहर्रम से एक विशेष आध्यात्मिक और भावनात्मक लगाव था। यह समय उनके लिए हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करने और शोक मनाने का था। वे इन दस दिनों के दौरान शहनाई नहीं बजाते थे और न ही किसी संगीतमय आयोजन में भाग लेते थे।
मुहर्रम की आठवीं तारीख को वे खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी से फातमान तक (लगभग आठ किलोमीटर) पैदल चलते हुए नौहा (शोक गीत) गाते जाते थे। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके साथियों के बलिदान से उपजे दुख से भरी रहती थीं। इस दौरान उनकी संवेदनशीलता और मानवीय भावना लोगों के दिलों में उनके प्रति और भी अधिक सम्मान पैदा करती थी।
प्रश्न 10. बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर 10:
• कला को ईश्वरीय वरदान मानना: बिस्मिल्ला खाँ शहनाई के महान कलाकार थे, लेकिन उन्होंने कभी इसे पैसा कमाने का जरिया नहीं बनाया। उनकी निष्काम साधना के कारण ही उन्हें ‘भारत रत्न’ जैसे सम्मान से नवाजा गया।
• ईश्वर से सच्ची कला की माँग: वे नमाज़ के बाद अक्सर यह दुआ करते, “मेरे मालिक, मुझे वह सुर दो जो दिल को छू ले और आँखों से मोती जैसे आँसू बहा दे।” यह दर्शाता है कि वे कला को भक्ति की तरह जीते थे।
• अपूर्णता की भावना: उन्हें हमेशा लगता था कि अभी भी उन्हें संगीत की गहराइयों को पूरी तरह समझना बाकी है। वे सातों सुरों को पूरी तरह साधने की चाह रखते थे।
• कला को ईश्वर की पूजा समझना: वे शहनाई को सिर्फ़ एक वाद्य नहीं, बल्कि भगवान विश्वनाथ और हज़रत इमाम हुसैन की भक्ति का माध्यम मानते थे। उनकी कला में धर्म और आस्था का गहरा समन्वय था।
• अथक रियाज़ (अभ्यास): वे घंटों शहनाई बजाकर अपनी कला को निखारते रहते थे। उनके लिए यह साधना थी, जिसमें वे पूरी तन्मयता से डूबे रहते थे।
• विनम्रता: जब लोग उनकी तारीफ़ करते, तो वे कहते, “यह मेरी कला नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा है।” उनका यह विनम्र भाव उनकी कला के प्रति समर्पण को दिखाता है।
• सादगी और निस्वार्थ भाव: उन्हें धन, शोहरत या आभूषणों से कोई मोह नहीं था। एक बार जब उनकी शिष्या ने उनकी फटी हुई लुंगी पर आपत्ति जताई, तो उन्होंने कहा, “यह भारत रत्न मुझे शहनाई ने दिया है, लुंगी ने नहीं!”
• जीवनभर सीखने की ललक: उनमें संगीत सीखने की जिजीविषा और आस्था कभी कम नहीं हुई। वे हमेशा नई सीख और सुधार के लिए तैयार रहते थे।
निष्कर्ष: इन सभी बातों से स्पष्ट है कि बिस्मिल्ला खाँ सच्चे अर्थों में कला के साधक थे। उनके लिए संगीत सिर्फ़ स्वरों का मेल नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का एक पवित्र माध्यम था।
भाषा-अध्ययन
प्रश्न 11. निम्नलिखित मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छाँटकर भेद भी लिखिए-
(क) यह जरूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।
उत्तर:
(i) यह ज़रूर है – प्रधान उपवाक्य
(ii) शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं – आश्रित संज्ञा उपवाक्य
(ख) रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है।
उत्तर:
(i) रीड अंदर से पोली होती है – प्रधान उपवाक्य
(ii) जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है – आश्रित विशेषण उपवाक्य
(ग) रीड नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।
उत्तर:
(i) रीड नरकट से बनाई जाती है – प्रधान उपवाक्य
(ii) जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है – आश्रित विशेषण उपवाक्य
(घ) उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा।
उत्तर:
(i) उनको यकीन है – प्रधान उपवाक्य
(ii) कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा – आश्रित संज्ञा उपवाक्य
(ङ) हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है।
उत्तर:
(i) हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है – प्रधान उपवाक्य
(ii) जिसकी गमक उसी में समाई है – आश्रित विशेषण उपवाक्य
(च) खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर ज़िंदा रखा।
उत्तर:
(i) खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है – प्रधान उपवाक्य
(ii) पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर ज़िंदा रखा – आश्रित संज्ञा उपवाक्य
प्रश्न 12. निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए-
(क) इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं।
उत्तर: यही वह बालसुलभ हँसी है, जिसमें कई यादें बंद हैं।
(ख) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।
उत्तर: काशी में संगीत आयोजन की एक परंपरा है, जो प्राचीन और अद्भुत है।
(ग) धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।
उत्तर: धत्! पगली, यह जो भारतरत्न हमें मिला है, वह शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं।
(घ) काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।
उत्तर: काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को प्रेरणा देता रहा है कि वे एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहें।
पाठेतर सक्रियता
- कल्पना कीजिए कि आपके विद्यालय में किसी प्रसिद्ध संगीतकार के शहनाई वादन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की सूचना देते हुए बुलेटिन बोर्ड के लिए नोटिस बनाइए ।
उत्तर: विद्यालय सूचना बोर्ड
विषय: शहनाई वादन कार्यक्रम
प्रिय विद्यार्थियों,
हमारे विद्यालय में एक विशेष संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें प्रसिद्ध शहनाई वादक [संगीतकार का नाम] जी शहनाई वादन प्रस्तुत करेंगे। यह कार्यक्रम विद्यालय के [स्थान का नाम] में [तारीख] को [समय] बजे आयोजित होगा।
यह एक अद्भुत अवसर है, जहाँ आप सभी भारतीय शास्त्रीय संगीत के इस उत्कृष्ट रूप का अनुभव कर सकेंगे। सभी विद्यार्थियों को इस कार्यक्रम में उपस्थित होने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
कृपया समय पर उपस्थित होकर इस संगीत आनंद का लाभ उठाएं।
सादर,
[विद्यालय का नाम]
[तारीख]
- आप अपने मनपंसद संगीतकार के बारे में एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर: मेरे पसंदीदा संगीतकार ए.आर. रहमान हैं, जो भारतीय संगीत जगत के एक महान हस्ताक्षर हैं। उन्होंने न सिर्फ बॉलीवुड, बल्कि पूरी दुनिया में अपने संगीत की धाक जमाई है। उनके संगीत में एक अद्भुत भावनात्मक गहराई होती है, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। रहमान साहब अपने संगीत में शास्त्रीय, पश्चिमी और भारतीय लोक धुनों का अनूठा संगम करते हैं, जिससे उनकी रचनाएँ हमेशा ताजगी भरी लगती हैं।
उन्होंने “दिल से”, “रंग दे बसंती” और “तनु वेड्स मनु” जैसी फिल्मों को यादगार संगीत दिया है, जो आज भी लोगों के दिलों में गूँजता है। उनकी धुनें सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खूब पसंद की जाती हैं। रहमान जी का संगीत किसी कला-कृति की तरह होता है, जो फिल्म के दृश्यों को और भी ज्यादा प्रभावशाली बना देता है।
उनका संगीत सुनना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक अनूठा अनुभव है। यह हमें शांति और उत्साह दोनों का एहसास कराता है। वे अपने संगीत के जरिए सामाजिक और भावनात्मक विषयों को भी बखूबी उठाते हैं, जिस वजह से उनके गीत लंबे समय तक याद रखे जाते हैं।
- हमारे साहित्य, कला, संगीत और नृत्य को समृद्ध करने में काशी (आज के वाराणसी) के योगदान पर चर्चा कीजिए।
उत्तर: काशी, जिसे आज हम वाराणसी के नाम से जानते हैं, भारतीय संस्कृति, साहित्य, कला, संगीत और नृत्य का एक अद्वितीय केंद्र रहा है। यह नगर न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रहा है। आइए, काशी के इन्हीं योगदानों पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
साहित्य में काशी का योगदान:
काशी भारतीय साहित्य का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ संस्कृत, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का सृजन हुआ है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक, काशी के विद्वानों और साहित्यकारों ने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया है। यहाँ के महान संत और कवि जैसे तुलसीदास, कबीर और भर्तृहरी ने अपनी रचनाओं से भारतीय साहित्य को नया आयाम दिया। तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि हिंदी साहित्य की एक अमर कृति भी है।
कला और शिल्प की दुनिया में काशी:
काशी ने भारतीय कला को भी नई ऊँचाइयाँ दी हैं। यहाँ के प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला अद्भुत है और काशी के कारीगरों ने पारंपरिक कलाओं को जीवित रखा है। काशी की बनारसी साड़ियाँ, धातु शिल्प और मिट्टी के बर्तन दुनिया भर में मशहूर हैं। यहाँ की चित्रकला और मूर्तिकला की विशेष शैलियाँ भारतीय कला का गौरव हैं।
संगीत और नृत्य में काशी की महत्ता:
काशी भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ के महान संगीतज्ञों जैसे पंडित रविशंकर (सितार), उस्ताद बिस्मिल्लाह खान (शहनाई) और पंडित किशन महाराज (तबला) ने भारतीय संगीत को विश्व पटल पर पहचान दिलाई। काशी में कई प्रसिद्ध संगीत विद्यालय हैं, जहाँ शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी जाती है।
नृत्य के क्षेत्र में काशी का सबसे बड़ा योगदान कथक नृत्य को माना जाता है। यहाँ के महान कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज ने इस नृत्य शैली को नई पहचान दी। आज भी काशी में कथक की शिक्षा देने वाले कई प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत:
काशी की पहचान इसके मंदिरों, घाटों और सांस्कृतिक आयोजनों से भी जुड़ी है। गंगा घाटों पर होने वाली गंगा आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। दशाश्वमेध घाट पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक उत्सव काशी की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं।
निष्कर्ष:
काशी ने सदियों से भारतीय साहित्य, कला, संगीत और नृत्य को संजोकर रखा है और इसे नई ऊर्जा दी है। आज भी यह शहर अपनी अमूल्य विरासत के लिए जाना जाता है और भारतीय संस्कृति की शान को बढ़ाता है। काशी की यह धरोहर न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए गर्व की बात है।
- काशी का नाम आते हो हमारी आँखों के सामने काशी की बहुत-सी चीजें उभरने लगती हैं, वे कौन-कौन सी हैं?
उत्तर: काशी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने इस पावन नगरी की अनेक यादें और दृश्य जीवंत हो उठते हैं। यह शहर अपनी आध्यात्मिकता, संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। आइए, जानते हैं कि काशी से जुड़ी वे कौन-सी खास बातें हैं जो इसे इतना विशेष बनाती हैं:
काशी विश्वनाथ मंदिर – भगवान शिव के इस पवित्र मंदिर का नाम सुनते ही मन श्रद्धा से भर जाता है। यह हिंदुओं का प्रमुख तीर्थस्थल है।
माँ गंगा का महत्व – काशी गंगा नदी के तट पर बसी है। यहाँ के घाट, जैसे दशाश्वमेध घाट और मणिकर्णिका घाट, श्रद्धालुओं के लिए आस्था के केंद्र हैं।
गंगा आरती का मनोरम दृश्य – शाम के समय घाटों पर होने वाली गंगा आरती का नज़ारा दिल को छू लेता है।
काशी की गलियाँ – संकरी गलियों में छुपी है इस शहर की पुरानी रौनक। विष्णु चौक और भवानी महल जैसी जगहें यहाँ के स्थानीय जीवन को दिखाती हैं।
मशहूर बनारसी साड़ी – जब भी काशी का नाम आता है, बनारसी साड़ियों की चमक-दमक याद आ जाती है। ये साड़ियाँ यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर हैं।
बनारसी पान का स्वाद – काशी की मिठास भरे पान की बात ही कुछ और है, जो यहाँ आने वाले हर शख्स को पसंद आता है।
संगीत और कला का संगम – काशी का बनारस घराना भारतीय शास्त्रीय संगीत में अपना एक विशेष स्थान रखता है।
शिव की नगरी – काशी को “शिव की नगरी” कहा जाता है। यहाँ की धार्मिक परंपराएँ और आस्था का भाव इसे अद्वितीय बनाते हैं।
ये सभी चीज़ें मिलकर काशी की पहचान बनाती हैं। यह न सिर्फ़ एक धार्मिक नगरी है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक जीता-जागता उदाहरण भी है।
पाठ 11: नौबतखाने मे इबादत पर आधारित अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न–उत्तर
लघु प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1. यतींद्र मिश्र के अनुसार, बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का कौन-सा अनुभव संगीत के प्रति उनका प्रेम जगाता था?
उत्तर: यतींद्र मिश्र बताते हैं कि बालाजी मंदिर के नौबतखाने में अपने मामाओं की शहनाई सुनकर और रसूलनबाई-बतूलनबाई की ठुमरी सुनकर बिस्मिल्ला खाँ के मन में संगीत के प्रति प्रेम जागा।
प्रश्न 2. यतींद्र मिश्र ने शहनाई और डुमराँव के संबंध को कैसे वर्णित किया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र के अनुसार, डुमराँव की सोन नदी के किनारे उगने वाली नरकट घास से शहनाई की रीड बनती थी, जिसने इस वाद्य को विशिष्ट ध्वनि प्रदान की।
प्रश्न 3. यतींद्र मिश्र के लेखन के अनुसार, बिस्मिल्ला खाँ काशी को क्यों नहीं छोड़ना चाहते थे?
उत्तर: यतींद्र मिश्र लिखते हैं कि बिस्मिल्ला खाँ काशी को अपनी जन्नत मानते थे, क्योंकि यहाँ गंगा, विश्वनाथ मंदिर और उनके पूर्वजों की संगीत परंपरा थी।
प्रश्न 4. यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ की सादगी को कैसे चित्रित किया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र के अनुसार, भारतरत्न जैसा सम्मान पाने के बाद भी बिस्मिल्ला खाँ साधारण जीवन जीते रहे। वे फटी लुंगी पहनकर शहनाई बजाते थे और मानते थे कि सम्मान उनकी कला को मिला है, न कि उन्हें।
प्रश्न 5. यतींद्र मिश्र के लेखन में बिस्मिल्ला खाँ और मुहर्रम का क्या संबंध दर्शाया गया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र ने वर्णन किया है कि मुहर्रम के दस दिनों तक बिस्मिल्ला खाँ शहनाई नहीं बजाते थे, लेकिन आठवें दिन दालमंडी तक पैदल नौहा गाते हुए जाते थे, जो उनकी धार्मिक आस्था और संगीत के बीच सामंजस्य को दर्शाता है।
प्रश्न 6. यतींद्र मिश्र के अनुसार बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में कुलसुम हलवाइन की क्या भूमिका थी?
उत्तर: यतींद्र मिश्र ने लिखा है कि कुलसुम हलवाइन की दुकान पर कचौड़ी तलने की आवाज से बिस्मिल्ला खाँ को संगीत के सुर सुनाई देते थे। यह अनूठा अनुभव उनके संगीतमय व्यक्तित्व को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
प्रश्न 7. यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई के संबंध को किस रूप में प्रस्तुत किया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र के लेखन में शहनाई को बिस्मिल्ला खाँ की आत्मा के रूप में चित्रित किया गया है। वे बताते हैं कि खाँ साहब के लिए शहनाई सिर्फ एक वाद्य नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का माध्यम थी।
प्रश्न 8. यतींद्र मिश्र के अनुसार बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना में काशी की क्या भूमिका थी?
उत्तर: यतींद्र मिश्र के लेखन के अनुसार, काशी की सांस्कृतिक धरोहर और संगीत परंपरा ने बिस्मिल्ला खाँ की कला को पूर्णता प्रदान की। यहाँ के मंदिरों और घाटों ने उनके संगीत को आध्यात्मिक गहराई दी।
प्रश्न 9. यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व के किस पहलू को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ की सादगी और सांप्रदायिक सद्भाव को उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बताया है। वे लिखते हैं कि खाँ साहब ने संगीत के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया।
प्रश्न 10. यतींद्र मिश्र के अनुसार बिस्मिल्ला खाँ को भारतरत्न मिलने के बाद क्या बदलाव आया?
उत्तर: यतींद्र मिश्र स्पष्ट करते हैं कि भारतरत्न मिलने के बाद भी बिस्मिल्ला खाँ के जीवनशैली और संगीत के प्रति समर्पण में कोई बदलाव नहीं आया। वे पहले की तरह ही सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे।
प्रश्न 11: ‘नौबतखाने में इबादत’ में अमीरुद्दीन की संगीत यात्रा की शुरुआत कैसे होती है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र के शब्दों में, अमीरुद्दीन उर्फ बिस्मिल्ला खाँ की संगीत यात्रा काशी के बालाजी मंदिर के नौबतखाने से शुरू होती है। वहाँ की शहनाई ध्वनि और रसूलनबाई-बतूलनबाई के गायन ने उनके मन में सुरों के प्रति आकर्षण जगाया। अपने मामाओं से रागों की बातें सुनते हुए, वह धीरे-धीरे संगीत की समझ विकसित करते हैं। यह परंपरा और वातावरण ही उनके सुरों की पहली पाठशाला बनती है।
प्रश्न 12: यतींद्र मिश्र ने बालसुलभ घटनाओं के ज़रिए बिस्मिल्ला खाँ को कैसे चित्रित किया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ की बचपन की घटनाओं को बड़ी आत्मीयता से प्रस्तुत किया है। जैसे—पत्थर पटककर ‘सम’ पर प्रतिक्रिया देना, शहनाई ढूँढ़ना, सुलोचना की फिल्में देखना और संगीत में ‘संगीतमय कचौड़ी’ ढूँढ़ना। ये घटनाएँ उनके बालमन की मासूमियत, जिज्ञासा और संगीत के प्रति स्वाभाविक लगाव को दर्शाती हैं। इन प्रसंगों से बिस्मिल्ला खाँ का सजीव चित्र सामने आता है।
प्रश्न 13: यतींद्र मिश्र द्वारा वर्णित बिस्मिल्ला खाँ की ‘इबादत’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘नौबतखाने में इबादत’ में यतींद्र मिश्र बताते हैं कि बिस्मिल्ला खाँ के लिए संगीत एक इबादत है, एक सच्चे सुर की तलाश। वे पाँचों वक्त की नमाज की तरह सुरों को साधने में लीन रहते हैं। उनका मानना है कि सुर में तासीर होनी चाहिए जो सीधे आत्मा को छू जाए। यह समर्पण, विनम्रता और साधना का प्रतीक है, जिससे एक कलाकार और भक्त का स्वरूप उभरता है।
प्रश्न 14: यतींद्र मिश्र ने डुमराँव और शहनाई का संबंध किस तरह बताया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र बताते हैं कि शहनाई और डुमराँव का गहरा संबंध है। शहनाई में उपयोग होने वाली रीड डुमराँव के सोन नदी किनारे पाई जाने वाली खास नरकट से बनती है। यही कारण है कि बिस्मिल्ला खाँ का जन्मस्थान डुमराँव शहनाई के लिए एक विशेष स्थान रखता है। यह स्थान उनके जीवन और वाद्ययंत्र की नींव को दर्शाता है।
प्रश्न 15: बिस्मिल्ला खाँ की यादों में कौन-से पल संजोए हुए हैं?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ को अपने बचपन की बातें, सुलोचना की फिल्में और कचौड़ी की दुकानें याद आती हैं। यतींद्र मिश्र ने इन यादों के माध्यम से खाँ साहब के जीवन को बेहद आत्मीयता से चित्रित किया है।
दीर्घ प्रश्नोत्तरी
प्रश्न 1: ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ में यतींद्र मिश्र ने उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की संगीत साधना को किस प्रकार चित्रित किया है?
उत्तर: लेखक यतींद्र मिश्र ने ‘नौबतखाने में इबादत’ में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की संगीत साधना को भक्ति और तपस्या के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने बताया कि बिस्मिल्ला ख़ाँ जी के लिए संगीत केवल पेशा नहीं था, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का माध्यम था। वे अपने संगीत को इबादत मानते थे और प्रतिदिन नियमित रूप से रियाज़ करते थे। उनके संगीत में बनारस की गंगा-जमुनी तहज़ीब झलकती है। लेखक ने उनकी विनम्रता, समर्पण और साधना से प्रेरणा लेने का संदेश दिया है।
प्रश्न 2: उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ बनारस और गंगा से इतना जुड़ाव क्यों महसूस करते थे?
उत्तर: उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ का बनारस और गंगा से आत्मिक जुड़ाव था। उनका जन्म भले ही डुमरांव, बिहार में हुआ हो, लेकिन बनारस को उन्होंने अपनी आत्मा माना। वे मानते थे कि गंगा की धारा, बनारसी तहज़ीब और वहाँ की संस्कृति उनके संगीत में रची-बसी है। गंगा की सुबह की आरती और बनारसी घाटों की शांति उन्हें रचनात्मक ऊर्जा देती थी। उनका मानना था कि यदि गंगा और बनारस न होते तो शायद वे शहनाई वादक न बन पाते।
प्रश्न 3: उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की विनम्रता पाठ में किस प्रकार दिखाई गई है?
उत्तर: ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की विनम्रता अनेक प्रसंगों में दिखाई गई है। उन्होंने कभी भी अपने यश और प्रसिद्धि का घमंड नहीं किया। जब भी कोई उन्हें सम्मानित करता या उनकी प्रशंसा करता, वे उसे ईश्वर की कृपा मानते। वे अपने शिष्यों और श्रोताओं के प्रति आदर भाव रखते थे। उन्होंने कभी भी भौतिक सुख-सुविधाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उनके जीवन में सादगी और समर्पण प्रमुख थे।
प्रश्न 4: यतींद्र मिश्र ने उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के संगीत को ‘इबादत’ क्यों कहा है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र ने उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के संगीत को ‘इबादत’ इसलिए कहा है क्योंकि उनके लिए संगीत कोई व्यावसायिक साधन नहीं था, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ईश्वर से जुड़ने का माध्यम था। वे नियमित रूप से रियाज़ करते थे और संगीत को पूजा के रूप में अपनाते थे। उनका हर सुर, हर राग, गंगा की शुद्धता और बनारसी तहज़ीब से ओतप्रोत था। इसलिए लेखक ने उनके संगीत को साधना और इबादत की संज्ञा दी है।
प्रश्न 5: बिस्मिल्ला ख़ाँ की देशभक्ति उनके व्यवहार में कैसे झलकती थी?
उत्तर: उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ की देशभक्ति उनके व्यवहार और सोच में स्पष्ट झलकती थी। उन्हें विदेशों से बहुत अच्छे प्रस्ताव मिले, लेकिन उन्होंने कभी भारत छोड़ने का विचार नहीं किया। वे कहते थे कि बनारस और गंगा को छोड़ना उनके लिए आत्मा को छोड़ने के समान है। उन्होंने हमेशा भारतीय संगीत को विश्वमंच पर सम्मान दिलाया, लेकिन स्वयं भारतीय संस्कृति और मिट्टी से जुड़े रहे। उनका यह समर्पण उनकी सच्ची देशभक्ति को दर्शाता है।
प्रश्न 6: यतींद्र मिश्र ने उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन सी विशेषताएँ प्रस्तुत की हैं?
उत्तर:यतींद्र मिश्र ने उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के व्यक्तित्व की अनेक विशेषताएँ प्रस्तुत की हैं—जैसे संगीत के प्रति समर्पण, सादगी, विनम्रता, देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता और आत्मिक चेतना। उन्होंने संगीत को पूजा का माध्यम माना और जीवनभर सादे तरीके से रहे। उनका व्यक्तित्व आध्यात्मिकता और तहज़ीब का संगम था। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक थे। लेखक ने उन्हें एक आदर्श संगीत साधक और इंसान के रूप में चित्रित किया है।
प्रश्न 7: बिस्मिल्ला ख़ाँ जी की साधना में ‘नौबतखाना’ का क्या महत्व था?
उत्तर: ‘नौबतखाना’ बिस्मिल्ला ख़ाँ जी की साधना का प्रमुख केंद्र था। बनारस के विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित इस स्थान पर वे प्रतिदिन रियाज़ करते थे। यह स्थान उनके लिए केवल एक अभ्यास स्थल नहीं था, बल्कि उनका ‘संगीत मंदिर’ था। यहाँ वे सुरों के माध्यम से ईश्वर से संवाद करते थे। लेखक ने बताया है कि वहाँ की शांति, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और गंगा की हवा उनके रागों में गूंजती थी। यह स्थान उनकी ‘इबादत’ का प्रतीक था।
प्रश्न 8: बिस्मिल्ला ख़ाँ का जीवन हमें क्या सीख देता है?
उत्तर: बिस्मिल्ला ख़ाँ का जीवन हमें सच्चे समर्पण, सादगी और ईमानदारी की प्रेरणा देता है। उन्होंने दिखाया कि प्रसिद्धि पाने के बाद भी विनम्रता कैसे बरकरार रखी जा सकती है। उनका जीवन बताता है कि कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना और आत्मिक अनुभव का मार्ग भी हो सकती है। उनका देशप्रेम, संगीत के प्रति निष्ठा और धर्मनिरपेक्षता आज के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
प्रश्न 9: बिस्मिल्ला ख़ाँ को शहनाई का ‘भगवान’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: बिस्मिल्ला ख़ाँ को शहनाई का ‘भगवान’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने इस वाद्य को मंदिरों से निकालकर विश्व के मंचों पर सम्मान दिलाया। उनकी शहनाई में ऐसा भाव होता था कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में शहनाई को ऊँचा स्थान दिलाया और इसे एकल वादन में मान्यता दिलाई। उनके सुरों में भक्ति, प्रेम और करुणा की भावनाएँ होती थीं। उन्होंने शहनाई को भक्ति का माध्यम बना दिया।
प्रश्न 10: यतींद्र मिश्र ने उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ और बनारस के रिश्ते को कैसे व्यक्त किया है?
उत्तर: यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला ख़ाँ और बनारस के रिश्ते को आत्मा और शरीर के रूप में व्यक्त किया है। उन्होंने बताया कि बनारस की गलियाँ, घाट, मंदिर, और गंगा उनके संगीत का हिस्सा थे। बनारस की सुबह और वहाँ का वातावरण उनकी रचनात्मकता का आधार था। बिस्मिल्ला ख़ाँ जी ने खुद कहा कि बनारस को छोड़ा तो सब कुछ छोड़ बैठेंगे। लेखक ने इस रिश्ते को बहुत भावुक और आत्मिक रूप में प्रस्तुत किया है।
प्रश्न 11. मुहर्रम के प्रति बिस्मिल्ला खाँ की भावनाएँ क्या थीं?
उत्तर: मुहर्रम के प्रति बिस्मिल्ला खाँ की गहरी श्रद्धा थी। वे इस दिन शहनाई पर राग नहीं बजाते थे, बल्कि नौहा (शोक गीत) गाते हुए दालमंडी तक पैदल जाते थे। उनकी आँखें इमाम हुसैन की शहादत को याद कर नम हो जाती थीं। यह परंपरा उनके खानदान की पहचान थी। यतींद्र मिश्र ने इसके माध्यम से बिस्मिल्ला खाँ की धार्मिक आस्था और संगीत के बीच के सामंजस्य को दर्शाया है।
प्रश्न 12. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ उन्हें महान बनाती हैं?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्तित्व सादगी, समर्पण और सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक था। वे भारतरत्न जैसे सम्मान पाकर भी फटी लुंगी पहनते थे और कहते थे – “सुर की इबादत ही असली पहचान है।” उन्होंने काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति को अपने संगीत में जीवित रखा। यतींद्र मिश्र ने उनकी इस मानवीय सरलता और कलात्मक महानता को बखूबी चित्रित किया है।
प्रश्न 13. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन में रसूलनबाई और बतूलनबाई का क्या महत्व था?
उत्तर: रसूलनबाई और बतूलनबाई बिस्मिल्ला खाँ के बचपन की प्रमुख प्रेरणा स्रोत थीं। ये दोनों गायिकाएँ काशी की संगीत परंपरा की धरोहर थीं, जिनके ठुमरी, दादरा और टप्पे सुनकर अमीरुद्दीन (बिस्मिल्ला खाँ) के मन में संगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ। खाँ साहब ने स्वीकार किया कि इन्हीं बहनों ने उनकी “अनुभव की स्लेट पर संगीत की वर्णमाला” लिखी। यतींद्र मिश्र ने इस संबंध को दर्शाते हुए लिखा है कि इन गायिकाओं की मधुर आवाज़ें बिस्मिल्ला खाँ के संगीत की नींव बनीं।
प्रश्न 14. शहनाई को ‘शाहेनय’ क्यों कहा जाता है? इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर: शहनाई को ‘शाहेनय’ (सुषिर वाद्यों का शाह) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अरबी मूल के वाद्य ‘नय’ का उन्नत रूप है, जिसमें नरकट (रीड) की मधुर ध्वनि होती है। ऐतिहासिक रूप से, तानसेन द्वारा रचित ‘राग कल्पद्रुम’ में शहनाई का उल्लेख मिलता है। अवध् के लोकगीतों और मंगलकारी अनुष्ठानों में इसका विशेष स्थान रहा है। यतींद्र मिश्र ने बताया है कि शहनाई की मंगलध्वनि ने इसे भारतीय संस्कृति में अमर बना दिया।

प्रश्न 15. बिस्मिल्ला खाँ की दैनिक दिनचर्या और साधना कैसी थी?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ की दिनचर्या अनुशासन और साधना से परिपूर्ण थी। वे प्रतिदिन पाँच वक्त की नमाज़ के बाद सच्चे सुर की प्राप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते थे। उनका मानना था कि सुर ईश्वर का वरदान है। वे काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर मुँह करके शहनाई बजाते थे, जो उनकी अंतरंग आस्था को दर्शाता था। यतींद्र मिश्र ने उनकी इस साधना को “सुर की इबादत” बताया है।
प्रश्न 16. काशी की संस्कृति ने बिस्मिल्ला खाँ के संगीत को कैसे आकार दिया?
उत्तर: काशी की सांस्कृतिक विविधता ने बिस्मिल्ला खाँ के संगीत को अद्वितीय बनाया। यहाँ की गंगा-जमुनी तहजीब, विश्वनाथ मंदिर की ध्वनियाँ, मुहर्रम का नौहा और होली का अबीर—सभी ने उनके संगीत में समावेश पाया। यतींद्र मिश्र के अनुसार, खाँ साहब ने काशी को “अपनी शहनाई की जन्नत” माना और इसके बिना अपने संगीत की कल्पना भी नहीं की।
प्रश्न 17. बिस्मिल्ला खाँ को भारतरत्न मिलने के बाद भी सादगी क्यों पसंद थी?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ की सादगी उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग थी। वे मानते थे कि सम्मान शहनाई की आवाज़ के लिए मिला है, न कि दिखावे के लिए। एक बार उन्होंने अपनी शिष्या से कहा था: “भारतरत्न शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।” यतींद्र मिश्र ने इस सादगी को उनकी “सच्ची कलात्मकता” का प्रतीक बताया है।
रिक्त स्थान भरिए (Fill in the Blanks):
(कोष्ठक में दिए गए शब्दों से सही उत्तर भरिए)
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म __________ (डुमराँव / काशी) में हुआ था।
बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की शिक्षा उनके __________ (मामा / पिता) से मिली।
लेखक यतींद्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ को __________ का प्रतीक बताया है।
शहनाई एक __________ वाद्य यंत्र है।
बिस्मिल्ला खाँ __________ मंदिर की दिशा में मुँह करके शहनाई बजाया करते थे।
बिस्मिल्ला खाँ __________ (हिंदू / मुस्लिम) होकर भी सभी धर्मों का सम्मान करते थे।
लेखक __________ (यतींद्र मिश्र / तुलसीदास) ने इस पाठ में बिस्मिल्ला खाँ का वर्णन किया है।
खाँ साहब __________ (मुहर्रम / होली) के अवसर पर विशेष रूप से नौहा बजाते थे।
बिस्मिल्ला खाँ ने संगीत को __________ मानकर उसकी पूजा की।
लेखक ने शहनाई को ‘सुषिर वाद्यों में __________’ कहा है।
उत्तर – तालिका:
डुमराँव
मामा
भारतीय संस्कृति
सुषिर
काशी विश्वनाथ
मुस्लिम
यतींद्र मिश्र
मुहर्रम
इबादत
शाह
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs):
1. उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म कहाँ हुआ था?
A) काशी
B) डुमराँव
C) पटना
D) लखनऊ
उत्तर: B) डुमराँव
2. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की शिक्षा किससे मिली थी?
A) उनके पिता से
B) उनके भाई से
C) उनके मामा से
D) उनके गुरु से
उत्तर: C) उनके मामा से
3. ‘नौबतखाने में इबादत’ पाठ के लेखक कौन हैं?
A) हरिवंश राय बच्चन
B) यतींद्र मिश्र
C) सुदर्शन
D) जयशंकर प्रसाद
उत्तर: B) यतींद्र मिश्र
4. शहनाई किस प्रकार का वाद्य यंत्र है?
A) तंत्री
B) अवनद्ध
C) सुषिर
D) घन
उत्तर: C) सुषिर
5. बिस्मिल्ला खाँ शहनाई को क्या मानते थे?
A) साधन
B) पेशा
C) इबादत
D) अभिनय
उत्तर: C) इबादत
6. बिस्मिल्ला खाँ किस मंदिर की ओर मुँह करके शहनाई बजाते थे?
A) दुर्गा मंदिर
B) काशी विश्वनाथ मंदिर
C) संकटमोचन मंदिर
D) बालाजी मंदिर
उत्तर: B) काशी विश्वनाथ मंदिर
7. बिस्मिल्ला खाँ किस धर्म से संबंध रखते थे?
A) सिख
B) ईसाई
C) हिंदू
D) मुस्लिम
उत्तर: D) मुस्लिम
8. बिस्मिल्ला खाँ किस अवसर पर नौहा बजाते थे?
A) ईद
B) होली
C) मुहर्रम
D) दिवाली
उत्तर: C) मुहर्रम
9. लेखक यतींद्र मिश्र के अनुसार बिस्मिल्ला खाँ क्या थे?
A) महान चित्रकार
B) अभिनय सम्राट
C) भारतीय संस्कृति के प्रतीक
D) धार्मिक गुरु
उत्तर: C) भारतीय संस्कृति के प्रतीक
10. शहनाई वाद्य यंत्र को लेखक ने क्या कहा है?
A) ताली का संग साथी
B) लय का देवता
C) सुषिर वाद्यों में शाह
D) ताल का योद्धा
उत्तर: C) सुषिर वाद्यों में शाह
11. बिस्मिल्ला खाँ का जीवन कैसा उदाहरण प्रस्तुत करता है?
A) राजनीतिक संघर्ष का
B) धार्मिक असहिष्णुता का
C) सांस्कृतिक एकता का
D) आर्थिक विपन्नता का
उत्तर: C) सांस्कृतिक एकता का
12. लेखक यतींद्र मिश्र का इस पाठ में उद्देश्य क्या है?
A) राजनीति का प्रचार
B) संगीत की आलोचना
C) बिस्मिल्ला खाँ के योगदान को दर्शाना
D) नए वाद्यों का परिचय
उत्तर: C) बिस्मिल्ला खाँ के योगदान को दर्शाना
13. बिस्मिल्ला खाँ किस भाषा में संवाद करते थे?
A) संस्कृत
B) अवधी
C) भोजपुरी
D) अंग्रेज़ी
उत्तर: C) भोजपुरी
14. बिस्मिल्ला खाँ का जीवन किस बात का प्रतीक है?
A) विलासिता का
B) धार्मिक द्वेष का
C) साधना और समर्पण का
D) संघर्ष और पराजय का
उत्तर: C) साधना और समर्पण का
15. बिस्मिल्ला खाँ किस शहर से जीवनभर जुड़े रहे?
A) कोलकाता
B) दिल्ली
C) काशी
D) आगरा
उत्तर: C) काशी
