Ch-7-Vichitra Sakshi, Class-10-sanskrit- (Shemushi-2)

Ultimate NCERT Solutions for Ch-7-Vichitra Sakshi

Updated Solution 2025-2026                               Updated Solution 2025-2026

NCERT Solutions for Class 10 Sanskrit-Shemushi-2
 (सप्तमः पाठः विचित्र: साक्षी)
( प्रश्न उत्तर, योग्यताविस्तार, भावविस्तार, विशेषण-विशेष्य, सन्धिं )

Ch-7-Vichitra Sakshi

(NCERT Book)
अभ्यासः 

1. एकपदेन उत्तरं लिखत।

(क) कीदृशे प्रदेशे पदयात्रा न सुखावहा?

उत्तर: (क) विजने।

(ख) अतिथिः केन प्रबुद्धः?

उत्तर: (ख) चौर-पादध्वनिना।

(ग) कृशकायः कः आसीत्?

उत्तर: (ग) अभियुक्तः।

(घ) न्यायाधीशः कस्मै कारागारदण्डम् आदिष्टवान्।

उत्तर: (घ) आरक्षिणे।

(ङ) कं निकषा मृतशरीरम् आसीत्?

उत्तर: (ङ) राजमार्गम्।


2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत-

(क) निर्धनः जनः कथं वित्तम् उपार्जितवान्?

उत्तर: क) निर्धनः जनः भूरि परिश्रम्य वित्तम् उपार्जितवान्।

(ख) जनः किमर्थं पदातिः गच्छति?

उत्तर: ख) जनः अर्थकार्श्येन् पदातिः गच्छति।

(ग) प्रसृते निशान्धकारे स किम् अचिन्तयत्?

उत्तर: ग) प्रसृते निशान्धकारे स अचिन्तयत्, यत् ‘विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा।’

(घ) वस्तुतः चौरः कः आसीत्?

उत्तर: घ) वस्तुतः चौरः आरक्षी एव आसीत्।

(ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान्?

उत्तर: ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी उक्तवान्- “रे दुष्ट ! तस्मिन् दिने त्वया अहं चोरितायाः मञ्जूषायाः वारितः। इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व । अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे” इति।

(च) मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति?

उत्तर: च) मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि नीतिं युक्तिं च समालम्ब्य लीलयैव साधयन्ति।


3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-

(क) पुत्रं द्रष्टुं सः प्रस्थितः।

उत्तर:(क) कं द्रुष्टुं सः प्रस्थितः?

(ख) करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।

उत्तर: ख) करुणापरो गृही कस्मै आश्रयं प्रायच्छत्?

(ग) चौरस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः।

उत्तर: ग) कस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः?

घ) न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः आसीत्।

उत्तर: घ) न्यायाधीशः कः आसीत्?

(ङ) स भारवेदनया क्रन्दति स्म।

उत्तर: ङ) स कथं क्रन्दति स्म?

(च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ

उत्तर: च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।


4. यथानिर्देशमुत्तरत-

  • ‘आदेशं प्राप्य उभौ अचलताम्’ अत्र किं कर्तृपदम्?
  • ‘एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तत् वर्णयामि’ – अत्र ‘मार्गे’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?
  • ‘करुणापरो गृही तस्मे आश्रयं प्रायच्छ्त्- अत्र ‘तस्मै’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्?
  • ‘ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्’ अस्मिन् वाक्ये किं क्रियापदम्?
  • ‘दुष्कराण्यपि कर्माणि’ – अत्र विशेष्यपदं किम्?

उत्तर: 4

(क) उभौ

(ख) अध्वनि

(ग) अतिथये

(घ) आदिष्टवान्

(ङ) कर्माणि।


5. (अ) सन्धिं/ सन्धिविच्छेदं च कुरुत-

उत्तर: 5:

(क) पदातिरेव                                        =              पदातिः + एव

(ख) निशान्धकारे                                  =              निशा + अन्धकारे

(ग) अभि + आगतम्                             =              अभ्यागतम्

(घ) भोजन + अन्ते                                =              भोजनान्ते

(ङ) चौरोऽयम्                                       =              चौरः + अयम्

(च) गृह + अभ्यन्तरे                              =              गृहाभ्यन्तरे

(छ) लीलयैव                                           =              लीलया + एव

(ज) यदुक्तम्                                           =              यत् + उक्तम्

(झ) प्रबुद्धः + अतिथिः                          =              प्रबुद्धोऽतिथिः


6. अधोलिखितानि पदानि भिन्न-भिन्न प्रत्ययान्तानि सन्ति। तानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां प्रत्ययानामधः लिखत-

परिश्रम्य, उपार्जितवान्, दापयितुम्, प्रस्थितः, द्रष्टुम, विहाय, पृष्टवान्, प्रविष्टः, आदाय, क्रोशितुम्, नियुक्तः, नीतवान्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान्, समागत्य, निशम्य, प्रोच्य, अपसार्य, मुदितः।

उत्तर: 6

ल्यप्                          क्त्त                     क्तवतु                       तुमुन्

परिश्रम्य                  प्रस्थितः           उपार्जितवान्           दापयितुम्

विहाय                     प्रविष्टः                 पृष्टवान्                  द्रष्टुम

आदाय                  नियुक्तः               नीतवान्                 क्रोशितुम्

समागत्य                मुदितः               आदिष्टवान्              निर्णेतुम्


7. (अ) अधोलिखितानि वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत-

(क) स बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवान्।

(ख) चौरः ग्रामे नियुक्तः राजपुरुषः आसीत्।

(ग) केचन चौरा: गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।

(घ) अन्येद्युः तो न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्त:।

उत्तर: 7

(क) ते बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवन्त:।

(ख) चौराः ग्रामे नियुक्ताः राजपुरुषाः आसन्।

(ग) केचन चौराः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टाः।

(घ) अन्येद्युः ते न्यायालये स्व-स्व – पक्षं स्थापितवन्तः।


7. (आ) कोष्ठकेषु दत्तेषु पदेषु यथानिर्दिष्टां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत-

(क) सः……….. निष्क्रम्य बहिरगच्छत्। (गृह शब्दे पंचमी)

(ख) गृहस्थः …………. आश्रयं प्रायच्छत्। (अतिथि शब्दे चतुर्थी)

(ग) तौ ………… प्रति प्रस्थितौ। (न्यायाधीश शब्दे द्वितीया)

(घ) ……………. चौर्याभियोगे त्वं वर्णत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे। (इदम् शब्दे सप्तमी)

(ङ) चोरस्य ……….. प्रबुद्ध: अतिथिः। (पादध्वनिशब्दे तृतीया)

उत्तर: 7 (आ)

(क) गृहात् (ख) अतिथये (ग) न्यायाधीशं (घ) अस्मिन् (ङ) पादध्वनिना।


योग्यताविस्तारः

(क) विचित्रः साक्षी – इस कथा में न्यायाधीश के द्वारा दी हुई उक्तियों का बहुत सुन्दर वर्णन है। न्याय प्रमाण के अधीन होता है, प्रमाण के बिना न्याय करना संभव नहीं । न्यायालय में न्यायाधीश किसी भी विषय का फैसला प्रमाण के अभाव में नहीं दे सकते। इस कथा में भी चोरी के अभियोग में न्यायाधीश ने प्रमाण के बिना फैसला देने को मना कर दिया।

            अगले दिन प्रमाण सहित घटना को सुनकर और देखकर ही न्यायाधीश ने ‘आरक्षी’ को ‘कारावास’ का दण्ड दिया तथा ‘अतिथि’ को सम्मान सहित मुक्त कर दिया। इस पाठ का यही सन्देश है कि गलत काम करने वाले को प्रमाण के आधार पर दण्ड अवश्य मिलता है ।

(ख) मतिवैभवशालिनः – बुद्धि-वैभव से युक्त विद्वान् ही अपनी बुद्धि के चातुर्य के बल से कठिन से कठिन, यहाँ तक कि असंभव कार्यों को भी सरलता से पूरा कर लेते हैं

(ग) स शवः – इस पाठ में ‘शव’ के रूप में विद्यमान जीवित प्राणी ही ‘विचित्र साक्षी’ (प्रमाण) है क्योंकि जो कुछ घटना वास्तव में घटी है पूर्णरूपेण सच को ही उसने प्रस्तुत किया है। इस प्रकार दोषी आरक्षी को उसके प्रमाण के अनुसार कारावास का दण्ड तथा अतिथि को सम्मानपूर्वक मुक्ति मिल जाती है।

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