पाठ 2 - तुलसीदास (Ncert Solutions) for Class 10 Hindi क्षितिज-2
Ultimate NCERT Solutions for पाठ 2 तुलसीदास प्रश्न उत्तर
Updated Solution 2024-2025 Updated Solution 2024-2025
NCERT Solutions for Class 10 Hindi
पाठ 2 तुलसीदास – दोहे, प्रश्न उत्तर, जीवन परिचय, सारांश, व्याख्या
तुलसीदास का जीवन परिचय
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ भक्ति कवियों में से एक हैं। इनका जन्म संवत् 1589 (सन् 1532 ई.) में राजापुर (चित्रकूट, उत्तर प्रदेश) में हुआ माना जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार, इनका जन्मस्थान सोरों (कासगंज, उत्तर प्रदेश) भी हो सकता है। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था।
जन्म के समय इनका नाम रामबोला रखा गया था। कहा जाता है कि इनका जन्म अशुभ मुहूर्त में हुआ था, जिसके कारण माता-पिता ने इन्हें त्याग दिया। इनका पालन-पोषण एक भिखारिन चुनिया ने किया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद तुलसीदास ने भिक्षाटन करना शुरू कर दिया।
शिक्षा एवं आध्यात्मिक जीवन
एक दिन, संत नरहरिदास ने इन्हें देखा और इन्हें अयोध्या ले गए। वहाँ उन्होंने तुलसीदास को राममंत्र की दीक्षा दी और इनका नाम तुलसीदास रखा। तुलसीदास ने काशी जाकर शेष सनातन जी से वेद, उपनिषद्, रामायण आदि का अध्ययन किया।
विवाह एवं गृहस्थ जीवन
तुलसीदास का विवाह रत्नावली नामक कन्या से हुआ। कहा जाता है कि वे अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार जब रत्नावली मायके गई हुई थीं, तो तुलसीदास उनसे मिलने के लिए रात में ही नदी पार कर गए। इस पर रत्नावली ने उन्हें डाँटते हुए कहा
“इतने प्रेम यदि श्रीराम से होता, तो तुम्हारा उद्धार हो जाता!”
इस घटना ने तुलसीदास के जीवन को बदल दिया। उन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर रामभक्ति में लीन हो गए।
रचनाएँ
तुलसीदास ने अनेक ग्रंथों की रचना की, जिनमें से प्रमुख हैं—
रामचरितमानस – अवधी भाषा में लिखित यह महाकाव्य हिंदू धर्म का पवित्र ग्रंथ माना जाता है।
विनय पत्रिका – भगवान राम को समर्पित भक्ति पदों का संग्रह।
कवितावली – रामकथा पर आधारित कविताएँ।
गीतावली – कृष्ण भक्ति से जुड़े पद।
दोहावली – नीति और भक्ति के दोहे।
हनुमान चालीसा – हनुमान जी की स्तुति में लिखित चालीस चौपाइयाँ।
मृत्यु
तुलसीदास जी का निधन संवत् 1680 (सन् 1623 ई.) में काशी (वाराणसी) में हुआ। मान्यता है कि उन्होंने अपने अंतिम समय में “राम-राम” का जाप करते हुए शरीर त्याग दिया।
साहित्यिक योगदान
तुलसीदास ने भक्ति काव्य को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। उनकी रामचरितमानस हिंदी साहित्य की अमर कृति है, जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आदर्श चरित्र प्रस्तुत किया गया है। उनके साहित्य में भक्ति, नीति, समर्पण और मानवता के गहन संदेश मिलते हैं।
निष्कर्ष
तुलसीदास न केवल एक महान कवि थे, बल्कि एक आदर्श भक्त, समाज सुधारक और धर्मप्रचारक भी थे। उनकी रचनाएँ आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
पाठ 2 तुलसीदास प्रश्न उत्तर
Updated Solution 2024-2025
प्रश्न अभ्यास
प्रश्न 1. परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए?
उत्तर 1: परशुराम के क्रोध के जवाब में, लक्ष्मण ने धनुष टूटने के कारण कुछ महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किए:
- लक्ष्मण ने कहा, “बचपन में हमने कई धनुष तोड़े, लेकिन तब आपने कभी इतना क्रोध नहीं किया। इस धनुष के प्रति इतनी ममता क्यों है?”
- “सभी धनुष तो एक जैसे ही होते हैं।”
- “राम ने इसे केवल नए धनुष के भ्रम में उठाया था।”
- “यह धनुष राम के केवल छूते ही टूट गया, इसमें उनका क्या दोष है? आप तो बिना किसी ठोस कारण के क्रोध कर रहे हैं।”
इस प्रकार लक्ष्मण ने तर्क देकर परशुराम को समझाने का प्रयास किया।
प्रश्न 2. परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण को जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने । शब्दों में लिखिए।
उत्तर 2 – राम के स्वभाव की विशेषताएँ
- विनम्रता: राम अत्यंत विनम्र थे। जब परशुराम ने गुस्से में धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछा, तो राम ने खुद को उनका सेवक बताया।
- आज्ञाकारिता: राम बड़ों की आज्ञा का पालन करते थे। उन्होंने परशुराम से यह भी पूछा कि उन्हें क्या करने की आज्ञा है।
- धैर्य: राम बेहद धैर्यवान थे। परशुराम के लक्ष्मण पर क्रोधित होने के बावजूद राम शांत रहे और प्रतिकार नहीं किया।
- मृदुभाषिता: राम हमेशा मधुर और शांत भाषा का प्रयोग करते थे। परशुराम और लक्ष्मण के बीच की तीखी बातचीत के दौरान उन्होंने शांत करने वाले वचन बोले।
लक्ष्मण के स्वभाव की विशेषताएँ
- तर्कशीलता: लक्ष्मण तर्कशील थे। उन्होंने परशुराम के साथ बातचीत के दौरान कई तार्किक बातें रखीं।
- बुद्धिमत्ता: लक्ष्मण अत्यंत बुद्धिमान थे। वे परशुराम को कभी अपनी बातों से क्रोधित कर देते और कभी प्रशंसा के माध्यम से व्यंग्य कर देते।
- व्यंग्य-कला में निपुणता: लक्ष्मण व्यंग्य करने में माहिर थे। उन्होंने अपने व्यंग्य से परशुराम को क्रोधित कर दिया।
- क्रोधी स्वभाव: लक्ष्मण का स्वभाव कुछ क्रोधी था। उन्होंने परशुराम के क्रोध का उत्तर भी क्रोध पूर्ण शब्दों से दिया।
- चतुराई: लक्ष्मण चतुर और हाजिर जवाब थे। उन्होंने परशुराम की बातों का उत्तर बड़ी चतुराई से दिया।
इस प्रकार राम और लक्ष्मण के स्वभाव की ये विशेषताएँ उनकी अद्वितीय व्यक्तित्व को दर्शाती हैं।
प्रश्न 3. लक्ष्मण और परशुराम के संवाद का जो अंश आपको सबसे अच्छा लगा उसे अपने शब्दों में संवाद शैली में लिखिए।
उत्तर 3 –
लक्ष्मण: “बचपन में हमने तो कई धनुष तोड़े थे, लेकिन आपने कभी इतना क्रोध नहीं किया। आखिर इस धनुष से आपकी इतनी भावनात्मक जुड़ाव क्यों है?”
परशुराम (गुस्से में): “तुम काल के प्रभाव में हो, इसीलिए बिना सोच-विचार बोले जा रहे हो। शिवजी के प्रसिद्ध धनुष को ‘धनुही’ कहने का साहस करते हो?”
लक्ष्मण (मुस्कुराते हुए): “मेरी दृष्टि में तो सारे धनुष एक जैसे ही होते हैं। फिर, इस पुराने धनुष के टूट जाने से क्या फर्क पड़ा? यह तो श्रीराम के स्पर्श से ही टूट गया। इसमें उनका क्या दोष? आप व्यर्थ ही क्रोधित हो रहे हैं।”
परशुराम: “अरे अभिमानी! तुम मुझे नहीं जानते। मैं तुम्हें बालक समझकर अभी छोड़ रहा हूँ। मैं बाल ब्रह्मचारी और क्रोध में अग्नि समान हूँ। अपने बाहुबल से मैंने कई बार पृथ्वी को राजाओं से खाली कर ब्राह्मणों को सौंपा है। सहस्रबाहु की भुजाओं को काटने वाले मेरे इस फरसे को देखो!” (फरसा दिखाते हैं।)
प्रश्न 4. परशुराम ने अपने विषय में सभा में क्या-क्या कहा, निम्न पद्यांश के आधार पर लिखिए-
बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही ॥
भुजवल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥
सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोक महीपकुमारा ॥
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर ।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ॥
उत्तर 4- परशुराम ने सभा में कहा, “मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ और स्वभाव से अत्यंत क्रोधी। मैं क्षत्रिय वंश के शत्रु के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हूँ। मैंने अपनी ताकत के बल पर धरती को राजाओं से मुक्त किया और इसे बार-बार ब्राह्मणों को समर्पित किया।”
इसके बाद, उन्होंने लक्ष्मण की ओर देखते हुए कहा, “यह मेरा फरसा देखो, जिससे मैंने सहस्रबाहु की भुजाएँ काटी थीं। लेकिन तुम अपने माता-पिता की चिंता में डूबकर विचलित मत हो। मेरा यह फरसा अत्यंत भयावह है और यह गर्भ में पल रहे शिशुओं को भी नष्ट करने की क्षमता रखता है।”
प्रश्न 5. लक्ष्मण ने वीर योद्धा को क्या-क्या विशेषताएँ बताई ?
उत्तर 5- लक्ष्मण द्वारा वीर योद्धा की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार बताई गई हैं:
- वीर योद्धा हमेशा धैर्यवान और संयमी होते हैं।
- वे किसी भी स्थिति में क्रोध या क्षोभ से प्रभावित नहीं होते।
- वे कभी भी किसी के प्रति अपशब्दों का प्रयोग नहीं करते।
- युद्ध के मैदान में अपनी वीरता को अपने साहसिक कार्यों से साबित करते हैं।
- अपनी वीरता का बखान स्वयं करने से बचते हैं।
- शत्रु का सामना करते हुए भी अपनी शक्ति और पराक्रम का ढिंढोरा नहीं पीटते।
प्रश्न 6. ‘साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है’ – इस कथन पर अपने विचार लिखिए।
उत्तर 6- साहस और शक्ति वे महत्वपूर्ण गुण हैं जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली और आकर्षक बनाते हैं। साहसी व्यक्ति अपनी शक्ति का सही दिशा में उपयोग कर सफलता की ऊँचाइयों को छूने में सक्षम हो जाता है। लेकिन, यदि साहस और शक्ति के साथ विनम्रता भी जुड़ जाए, तो ऐसा व्यक्ति समाज में न केवल ऊँचा स्थान पाता है, बल्कि सबका प्रिय भी बन जाता है।
इसके विपरीत, यदि साहस और शक्ति होने के बावजूद व्यक्ति उद्दंड और अभिमानी व्यवहार करता है, तो लोग उसका सम्मान करना बंद कर देते हैं। उसके अन्य सभी गुण महत्वहीन हो जाते हैं, और वह समाज में नफरत का पात्र बन जाता है। इसलिए, यह जरूरी है कि साहस और शक्ति के साथ-साथ विनम्रता को भी अपनाया जाए। यही गुण एक सच्चे और सफल व्यक्तित्व की पहचान है।
प्रश्न 7. भाव स्पष्ट कीजिए-.
- बिहसि लखन बोले मृदु बानी ।
अहो मुनीसु महाभट मानी ।।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू !
चहत उड़ावन फूँकि पहारू ।।
- इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं ।
जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥।
देखि कुठारु सरासन बाना |
मैं कछु कहा सहित अभिमाना ।।
- गांधिसू नु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ ।
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ॥
उत्तर 7:
(क) भाव: जब परशुराम ने लक्ष्मण को फरसा दिखाया, तो लक्ष्मण मुस्कराते हुए शांत स्वर में बोले, “अरे मुनीश्वर! आप तो खुद को बहुत बड़ा योद्धा समझते हैं। बार-बार फरसा दिखाकर मानो मुझे डराना चाहते हैं। लेकिन पहाड़ को फूँक मारकर उड़ाना इतना आसान नहीं है।”
लक्ष्मण के इस कथन का आशय यह है कि वह अपनी वीरता में परशुराम से कम नहीं हैं और इसलिए वह उनसे डरते नहीं।
(ख) भाव: लक्ष्मण कहते हैं, “यहाँ कोई कुम्हड़े की बतिया (कच्चा फल) नहीं है जो किसी के तर्जनी उँगली दिखाने मात्र से मुरझा जाए। मैंने परशुराम का कुठार और धनुष-बाण देखकर ही आत्मविश्वास से ऐसा कहा है।”
इस कथन से लक्ष्मण यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि उन्हें बच्चा समझना परशुराम की भूल है। वे न केवल परशुराम के हथियारों को देख चुके हैं, बल्कि उन्हें अपनी वीरता पर गर्व भी है।
(ग) भाव: जब परशुराम ने क्रोध में कहा कि वे लक्ष्मण को कुठार से काट डालते, लेकिन विश्वामित्र के शील के कारण ऐसा नहीं कर रहे, तब विश्वामित्र मन ही मन मुस्कराए और सोचा, “मुनि तो बस हरा-भरा गन्ना देख रहे हैं, पर यह लक्ष्मण तो फौलादी तलवार है, कोई साधारण गन्ना नहीं।”
विश्वामित्र के कथन का आशय यह है कि परशुराम लक्ष्मण को एक साधारण बालक समझने की भूल कर रहे हैं। उन्हें लक्ष्मण की अदम्य शक्ति और साहस का अंदाजा नहीं है, इसीलिए वह उन्हें तुच्छ मान बैठे हैं।
प्रश्न 8 पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा – सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए ।
उत्तर 8: तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना साहित्यिक अवधी भाषा में की है। उनकी भाषा में अनूठी विशेषताएँ हैं, जो उनके काव्य को सरल, प्रभावशाली और सरस बनाती हैं।
- तुलसीदास की भाषा में भावनाओं को प्रसंगानुसार सजीव और सटीक रूप से व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है।
- उन्होंने सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग किया है, जिससे पाठकों को काव्य समझने में कोई कठिनाई नहीं होती।
- उनकी भाषा में सरसता, प्रवाहमयता और सहजता है, जो पाठकों को आकर्षित करती है।
- रामचरितमानस में चौपाई और दोहा छंदों का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया गया है।
- अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक जैसे अलंकारों का सुंदर और आकर्षक प्रयोग तुलसीदास की काव्यशैली को और समृद्ध बनाता है।
- व्यंग्यात्मक भावों को अभिव्यक्त करने में तुलसीदास ने अत्यंत उपयुक्त और प्रभावी भाषा का चयन किया है।
- उनकी भाषा वीर रस की अनुभूति कराने में पूर्णतः सक्षम है।
- तुलसीदास की काव्य शैली में संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है, जो पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
- उन्होंने अपने काव्य के सभी पात्रों के व्यक्तित्व को उजागर करने में भाषा का प्रभावी उपयोग किया है।
- लोकोक्तियों और मुहावरों का सुंदर और सटीक प्रयोग उनकी भाषा को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
प्रश्न 9. इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- 9 : ‘राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद’ के पूरे प्रसंग में व्यंग्य अपनी उत्कृष्टता के साथ प्रकट हुआ है।
- इस प्रसंग की शुरुआत में ही जब राम कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला तो आपका कोई सेवक ही होगा, तब परशुराम व्यंग्यपूर्ण स्वर में उत्तर देते हैं कि शत्रुता का कार्य करना सेवकाई नहीं होती:
“सेवकु सौ जो करै सेवकाई।
अरिकरनी करि करिअ लराई।।”
- लक्ष्मण और परशुराम के बीच हुए संवाद व्यंग्यात्मक प्रहारों के सुंदर उदाहरण हैं। लक्ष्मण जब सभी धनुषों को समान बताते हुए कहते हैं कि परशुराम बिना वजह क्रोधित हो रहे हैं, तब परशुराम अपने फरसे की ओर इशारा करते हुए कहते हैं:
“मातु पितहि जनि सोचबस करंसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।”
- इस पर लक्ष्मण व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि बार-बार फरसा दिखाने से क्या आप हवा से पहाड़ उड़ा देंगे? यहां कोई कच्चा कुम्हड़ा नहीं है जो उंगली दिखाने मात्र से मर जाए:
“इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं।
जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।”
- परशुराम जब बार-बार अपनी वीरता का बखान करते हैं, तो लक्ष्मण उनकी वीरता पर व्यंग्य करते हुए उन्हें कायर तक कह देते हैं:
“सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।”
- इस प्रकार पूरे प्रसंग में व्यंग्य का गहरा और अनूठा सौंदर्य उभरकर सामने आता है।
प्रश्न 10. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए-
(क) बालकु बोलि बधौं नहि तोही ।
(ख) कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा ।
(ग) “तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा।
बार बार मोहि लागि बोलावा ॥”
(घ) “लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु ।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ॥”
उत्तर 10:
(क) बालकु बोलि बधौं नहि तोही – अनुप्रास अलंकार (यहां “ब” ध्वनि की पुनरावृत्ति हो रही है, जो अनुप्रास अलंकार को दर्शाती है।)
(ख) कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा – उपमा अलंकार (यहां “कोटि कुलिस” और “बचन” की तुलना की जा रही है, जो उपमा अलंकार है।)
(ग) तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा ॥ – उत्प्रेक्षा अलंकार (यहां “कालु हाँक” और “लावा” का उदाहरण देते हुए एक विशेष स्थिति और प्रसंग को व्यक्त किया जा रहा है, इसलिए उत्प्रेक्षा अलंकार है।)
(घ) लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ॥ – उपमा अलंकार (यहां “बचन” की तुलना जल से की जा रही है, जो उपमा अलंकार है।)
रचना और अभिव्यक्ति
प्रश्न 11. “सामाजिक जीवन में क्रोध की जरूरत बराबर पड़ती है। यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दूसरे के द्वारा पहुँचाए जाने वाले बहुत से कष्टों की चिर- निवृत्ति का उपाय हो न कर सके।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि क्रोध हमेशा नकारात्मक भाव लिए नहीं होता बल्कि कभी-कभी सकारात्मक भी होता है। इसके पक्ष या विपक्ष में अपना मत प्रकट कीजिए।
उत्तर 11: ‘क्रोध सकारात्मक भी होता है’ – पक्ष में तर्क
- हालांकि क्रोध एक नकारात्मक भावना मानी जाती है, लेकिन कभी-कभी इसका रूप सकारात्मक भी हो सकता है। कई बार समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्रोध आवश्यक हो जाता है।
- कुछ लोग बिना किसी कारण या अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं। ऐसे लोग समाज की शांति और खुशहाली में बाधा डालते हैं।
- जब ऐसे लोग पीड़ितों द्वारा क्रोधित होकर सजा पाते हैं, तो वे डर के कारण फिर से किसी का नुकसान नहीं करते।
- इस प्रकार, कभी-कभी क्रोध समाज की रक्षा करने में भी मदद करता है।
- जैसे रावण के अत्याचारों से त्रस्त होकर राम ने क्रोध में आकर उसे नष्ट कर दिया, और कृष्ण ने कंस के दुष्कर्मों से क्रोधित होकर उसे मार डाला।
- इस तरह से समाज को अत्याचारों से मुक्त करने वाला क्रोध सकारात्मक माना जा सकता है।
प्रश्न 12. संकलित अंश में राम का व्यवहार विनयपूर्ण और संगत है, लक्ष्मण लगातार व्यंग्य बाणों का उपयोग करते हैं और परशुराम का व्यवहार क्रोध से भरा हुआ है। आप अपने आपको इस परिस्थिति में रखकर लिखें कि आपका व्यवहार कैसा होता ।
उत्तर 12 – यदि मुझे इस परिस्थिति में रखा जाए, तो मैं राम की तरह विनम्र और संगत व्यवहार अपनाने की कोशिश करूंगा। राम का व्यवहार आदर्श है क्योंकि वे हर परिस्थिति में संतुलित और समझदारी से काम लेते हैं। विनयपूर्ण व्यवहार से न केवल सम्मान मिलता है, बल्कि इससे किसी भी तनावपूर्ण स्थिति को सुलझाना आसान हो जाता है।
लक्ष्मण का व्यंग्यात्मक व्यवहार और परशुराम का क्रोधपूर्ण गुस्सा दोनों ही किसी भी समस्या को हल करने में मदद नहीं करते। क्रोध और व्यंग्य से केवल विवाद बढ़ता है और रिश्ते खराब होते हैं। मैं यह समझता हूं कि गुस्से में या उग्र शब्दों से बात करने से स्थिति और भी जटिल हो सकती है, इसलिए मैं शांत और सोच-समझकर बात करने को प्राथमिकता दूंगा।
इसलिए, यदि मैं राम की जगह होता, तो मैं विनम्रता और समझदारी से बातचीत करता, हर किसी के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करता और कोशिश करता कि समस्या का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से हो।
प्रश्न 13. अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर 13 – मेरे मित्र का स्वभाव कुछ इस प्रकार है:
- मेरा मित्र बहुत ही शालीन और सौम्य स्वभाव का है।
- वह मिलनसार और खुशमिजाज है। वह कभी किसी से लड़ाई नहीं करता।
- वह धैर्यवान और शांतचित्त है, किसी भी कठिन परिस्थिति में भी घबराता नहीं है और पूरी समझदारी से उसका सामना करता है।
- वह हमेशा सच बोलता है और झूठ बोलने वालों से दूर रहता है।
- समय के प्रति उसकी प्रतिबद्धता बहुत ज्यादा है, वह अपने सभी कार्य समय पर पूरा करता है।
- वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता है।
- अपने से बड़े व्यक्तियों का वह हमेशा सम्मान करता है।
प्रश्न 14. दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए- इस शीर्षक को ध्यान में रखते हुए एक कहानी लिखिए।
उत्तर 14 – कहानी: “सभी की अपनी शक्ति होती है”
एक छोटे से गाँव में एक बार एक बुद्धिमान शिक्षक ने बच्चों को यह सिखाने का निर्णय लिया कि हमें कभी भी दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए। उन्होंने अपनी कक्षा में एक कहानी सुनाने का सोचा।
एक दिन, गाँव में एक बड़ी सभा हुई। सभी लोग इकट्ठा हुए थे और गाँव के सबसे बड़े कागज व्यापारी, श्रीमान रामलाल ने मंच पर आकर अपने व्यापार की सफलता के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “मेरे पास सबसे अच्छा कागज है, और मैं इसे इस गाँव में सबसे अच्छे दाम पर बेचता हूँ। मेरे व्यापार की कोई बराबरी नहीं कर सकता।”
सभी लोग उनकी बातों से प्रभावित हुए, लेकिन एक छोटी सी लड़की, जो कक्षा में बैठी थी, ने उन्हें ध्यान से सुना। लड़की का नाम मीरा था। मीरा बहुत शांत और विनम्र थी, लेकिन उसे यह बात समझ में आ गई कि श्रीमान रामलाल का दावा शायद सच्चा नहीं हो सकता।
एक दिन, मीरा ने रामलाल से पूछा, “क्या आप जानते हैं कि कागज पर चित्र कैसे बनाए जाते हैं? क्या आप जानते हैं कि कागज का एक छोटा सा टुकड़ा भी कितना महत्वपूर्ण हो सकता है?” रामलाल हंसी में बोले, “क्या तुम समझती हो कि मैं नहीं जानता? तुम तो सिर्फ एक छोटी लड़की हो!”
मीरा मुस्कुराई और बोली, “ठीक है, आप इसे एक चुनौती मान सकते हैं। मैं आपको दिखाऊंगी कि कागज की असली शक्ति क्या है।” रामलाल ने उसे चुनौती स्वीकार की, यह सोचकर कि यह बच्ची उसे कोई चुनौती नहीं दे सकती।
मीरा ने अगले दिन एक सुंदर चित्र बनाया, जिसमें गाँव की हर एक विशेषता को दर्शाया गया था। वह कागज का उपयोग न केवल चित्र बनाने के लिए, बल्कि उसे एक कला के रूप में प्रस्तुत करने के लिए भी जानती थी। जब रामलाल ने उस चित्र को देखा, तो उसकी आँखें खुली रह गईं। वह समझ गया कि कागज की ताकत केवल व्यापार में नहीं है, बल्कि कला में भी है।
मीरा ने रामलाल से कहा, “कभी भी किसी की क्षमता को कम मत समझिए, क्योंकि हर व्यक्ति की अपनी ताकत होती है। आप व्यापार में महान हो सकते हैं, लेकिन मुझे कला में अपनी पहचान बनाने का मौका दिया गया है। हम सभी में कुछ विशेष होता है, जो हमें अलग बनाता है।”
रामलाल शर्मिंदा हुआ और उसने मीरा से माफी मांगी। उसके बाद, उसने कभी किसी की क्षमता को कम नहीं आंका और सभी को समान दृष्टिकोण से देखने लगा।
सीख: हमें कभी भी दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति में कुछ विशेष होता है, जो उसे अद्वितीय बनाता है।
प्रश्न 15. उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो।
उत्तर 15 – यहां कुछ घटनाओं के उदाहरण दिए गए हैं:
- स्कूल में अनुशासनहीनता: एक बार मेरे स्कूल में कुछ छात्र अनुशासन का उल्लंघन कर रहे थे, और उन्हें सजा नहीं दी जा रही थी। मैंने अपने अध्यापक से इस विषय में बात की और उन्हें इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की, ताकि उचित कार्रवाई की जा सके। यह किसी अन्याय का प्रतिकार था, क्योंकि अनुशासनहीनता के कारण बाकी छात्रों के लिए उचित माहौल बाधित हो रहा था।
- सड़क पर भेदभाव: एक बार सड़क पर मैंने देखा कि कुछ लोग अपने रंग और जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार हो रहे थे। मैंने उन लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि सभी को समान सम्मान और अवसर मिलना चाहिए, चाहे उनकी जाति या रंग कोई भी हो।
- पारिवारिक अन्याय: एक बार मेरे परिवार में किसी सदस्य के साथ अन्याय हो रहा था, जैसे कि किसी का अधिकार छिनना या किसी को अपमानित करना। मैंने खुलकर इसके खिलाफ आवाज उठाई और मामले को सही तरीके से सुलझाने का प्रयास किया।
- कामकाजी स्थान पर असमानता: मेरे कामकाजी स्थान पर एक बार कुछ महिला कर्मचारियों को समान काम के बावजूद कम वेतन मिल रहा था। मैंने इस पर ध्यान दिया और अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की, ताकि वेतन समान रूप से दिया जाए।
प्रश्न 16. अवधी भाषा आज किन-किन क्षेत्रों में बोली जाती है?
उत्तर 16 – अवधी भाषा मुख्य रूप से उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाती है। यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र, जिसमें लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, फैजाबाद, सुलतानपुर, बहराइच, और बाराबंकी जिले शामिल हैं, में बोली जाती है। इसके अतिरिक्त, अवधी भाषा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों और बिहार, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड, और नेपाल के तराई क्षेत्र में भी बोली जाती है।
अवधी भाषा का इतिहास और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत गहरा है, और यह हिंदी भाषा परिवार का एक प्रमुख हिस्सा मानी जाती है।

पाठ पर आधारित अन्य प्रश्न उत्तर
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस से
1. नाथ संभु धनु भंजनिहारा।
होइहिं वेदउ एक दास तुम्हारा।।
व्याख्या: यहाँ जनकजी परशुराम से कहते हैं कि हे मुनि! जो भगवान शंकर के धनुष को तोड़ने वाले हैं, वे कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि अवश्य ही कोई परमात्मा के तुल्य हैं और अंततः वे भी आपके शरणागत होकर आपके भक्त बनेंगे।
2. आयेसु काह कहिअ किन मोही।
सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
व्याख्या: जब जनकजी ने परशुराम को शांत करने का प्रयास किया, तो वे और अधिक क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि तुम मुझसे क्यों कह रहे हो? यह तो मेरे अपमान का विषय है।
3. सेवक सोइ जो करै सेवकाई।
अरि करनी करि करिअ लराई।।
व्याख्या: परशुराम कहते हैं कि सच्चा सेवक वही है जो सेवा करे। लेकिन जो दुश्मनी का व्यवहार करता है, उससे शत्रु जैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए।
4. सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा।
सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
व्याख्या: परशुराम श्रीराम से कहते हैं कि जिसने यह शिवजी का धनुष तोड़ा है, वह मेरे लिए सहस्त्रबाहु के समान शत्रु है।
5. सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।
न त मारे जैहहिं सब राजा।।
व्याख्या: परशुराम चेतावनी देते हैं कि जिसने यह अपराध किया है, उसे इस सभा से अलग कर दो, नहीं तो मैं सभी राजाओं को मार डालूंगा।
6. सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।
बोले परसुधरहि अवमाने।।
व्याख्या: जब लक्ष्मण ने मुनि की बातें सुनीं, तो वे मुस्कराने लगे और परशुराम का कुछ मजाक करते हुए विनोदपूर्वक बोले।
7. बहु धनुहीं तोरी लरिकाई।
कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
व्याख्या: लक्ष्मण कहते हैं कि हमने बचपन में भी कई धनुष तोड़े हैं, लेकिन किसी ने इस तरह गुस्सा नहीं किया जैसे आप कर रहे हैं।
8. येहि धनु पर ममता बेगि हेतू।
सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
व्याख्या: परशुराम को लगता है कि लक्ष्मण इस धनुष को तुच्छ समझकर उनका अपमान कर रहे हैं, इस पर वे क्रोधित हो उठते हैं।
9. नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।
व्याख्या: परशुराम कहते हैं कि तुम एक राजा के बिगड़े हुए बालक हो, जो सोच-समझकर नहीं बोलते। यह कोई साधारण धनुष नहीं है, यह त्रिपुरासुर का नाश करने वाले शिव का धनुष है, जो पूरे संसार में प्रसिद्ध है।
10. लखन कहा हँसि हमरे जाना।
सुनहु देव सब धनुष समाना।।
व्याख्या: लक्ष्मण हँसते हुए कहते हैं कि हे मुनि! हमारे लिए तो सभी धनुष एक जैसे ही हैं, चाहे वह किसी का भी हो।
11. का छति लाभु जु धनु तोरें।
देखा राम नयन भरि भोरें।।
व्याख्या: लक्ष्मण व्यंग्य करते हैं कि आपके धनुष को तोड़कर हमें क्या लाभ हुआ और न ही कोई हानि हुई। बस रामजी ने उसे श्रद्धा से देखा और वह टूट गया।
12. छुअत टूटि रघुपतिहु न दोषू।
मुनि बिनु काज करिअ कत रोषू।।
व्याख्या: वह धनुष तो रामजी के मात्र छूने से ही टूट गया, इसमें उनका कोई दोष नहीं है। आप बिना कारण ही क्रोध कर रहे हैं।
13. बोले चितै परसु की ओरा।
रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
व्याख्या: परशुराम ने अपने फरसे की ओर देखा और बोले, “रे मूर्ख! तू अब तक मेरे स्वभाव को नहीं समझ पाया है।”
14. बालबद बोलि बधौं नहि तोही।
बेगि मुनि जड़ जानहिं मोही।।
व्याख्या: परशुराम कहते हैं, “तू बालक की तरह बात कर रहा है, इसलिए मैं तुझे मार नहीं रहा हूँ, वरना मूर्ख मुनि मुझे जान लेते।”
15. बाल ब्रह्मचारी अति कोही।
बिस्वबिदित क्षत्रिय कुल द्रोही।।
व्याख्या: परशुराम स्वयं को वर्णन करते हुए कहते हैं कि मैं एक ब्रह्मचारी हूं, परंतु अति क्रोधी हूं और क्षत्रियों का विरोधी भी।
16. भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही।
बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
व्याख्या: परशुराम गर्व से कहते हैं कि मैंने अपने बल से पृथ्वी को क्षत्रियों से खाली कर दिया और उसे ब्राह्मणों को दान में दे दिया।
17. सहसबाहु भुज छेदनिहारा।
परसु बिलोकि महीपनि मारा।।
व्याख्या: मैं वही हूं जिसने सहस्त्रबाहु की भुजाएँ काट दी थीं और जिनके परशु (फरसे) को देखकर बड़े-बड़े राजा डर से कांपते थे।
18. मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीस किशोर।
गर्भन्ह बिन अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।
व्याख्या: हे राजा के बालक! तू अपने माता-पिता के मोह में आकर मुझे कमजोर मत समझ। मेरे परशु ने तो गर्भ में पल रहे शिशुओं तक को नहीं छोड़ा है।
19. बिहसि लखनु बोले मृदु बानी।
अहो मुनीसु महाभट मानी।।
व्याख्या: लक्ष्मण मुस्कराकर कोमल वाणी में कहते हैं — हे मुनि! आप तो महान योद्धा माने जाते हैं।
20. पुनि पुनि मोहि देखाव उठारू।
चहत उड़ावन पूंछि पहारू।।
व्याख्या: आप बार-बार मुझे हथियार दिखा रहे हैं, जैसे कोई पहाड़ को उड़ाने के लिए फूंक मार रहा हो।
21. इहाँ उमारगबतियाँ कोउ नाहीं।
जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
व्याख्या: यहाँ कोई ऐसा डरपोक नहीं बैठा है जो आपकी ऊँगली दिखाने से ही मर जाएगा।
22. देखि उठारू सरासन बाना।
मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।
व्याख्या: आपका धनुष-बाण देखकर मैंने भी कुछ गर्वपूर्वक कह दिया, परंतु उसमें कोई अपराध नहीं
23. भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी।
जो कछु कहहुँ सहौं रिस रोकी।।
व्याख्या: मैंने आपको ब्राह्मण समझकर आपके जनेऊ का सम्मान किया और आपकी बातों को सहन करता रहा।
24. सुर, महिसुर, हरिजन अरु गाई।
हमरे बल इन्ह पर न सुराई।।
व्याख्या: देवता, राक्षस, साधु-संत या पशु — हमारे बल का प्रभाव सभी पर एक समान रहता है।
25. बधें पापु, अपकीरति हारें।
मारतहुँ पा परिअ तुम्हारें।।
व्याख्या: हम केवल पापियों का नाश करते हैं और बदनामी से बचते हैं, इसलिए यदि आपको मारना भी पड़े तो भी आपके चरणों में गिरकर क्षमा मांगेंगे।
26. कोटि बिप्रसम बचनु तुम्हारा।
व्यर्थ धरहु धनु, बान, उठारा।।
व्याख्या: आपका यह क्रोध लाखों ब्राह्मणों जैसा ही वचन है, परंतु धनुष-बाण उठाकर व्यर्थ ही भय फैलाना उचित नहीं है।
27. जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमुनि बोले गिरा गंभीर।।
व्याख्या: यदि मैंने कोई अनुचित बात कही हो तो हे धैर्यवान मुनि! कृपया क्षमा करें। यह सुनकर भृगुवंश में जन्मे परशुराम फिर गंभीर वाणी में बोले।
